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| − | پیغام افغانی با ملت روسیہ
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| − | '''جمال الدین افغانی کا پیغام روسیوں کے نام۔'''
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| − | منزل و مقصود قرآن دیگر است
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| − | رسم و آئین مسلمان دیگر است
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| − | در دل او آتش سوزندہ نیست
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| − | مصطفی در سینہ او زندہ نیست
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| − | بندہ مومن ز قرآن بر نخورد
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| − | در ایاغ او نہ می دیدم نہ درد
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| − | خود طلسم قیصر و کسری شکست
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| − | خود سر تخت ملوکیت نشست
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| − | تا نہال سلطنت قوت گرفت
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| − | دین او نقش از ملوکیت گرفت
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| − | از ملوکیت نگہ گردد دگر
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| − | عقل و ہوش و رسم و رہ گردد دگر
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| − | تو کہ طرح دیگری انداختی
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| − | دل ز دستور کہن پرداختی
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| − | ہمچو ما اسلامیان اندر جہان
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| − | قیصریت را شکستی استخوان
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| − | تا بر افروزی چراغی در ضمیر
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| − | عبرتی از سر گذشت ما بگیر
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| − | پای خود محکم گذار اندر نبرد
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| − | گرد این لات و ہبل دیگر مگرد
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| − | ملتے می خواہد این دنیای پیر
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| − | آنکہ باشد ہم بشیر و ہم نذیر
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| − | باز می آئی سوی اقوام شرق
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| − | بستہ ایام تو با ایام شرق
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| − | تو بجان افکندہ ئی سوزی دگر
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| − | در ضمیر تو شب و روزی دگر
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| − | کہنہ شد افرنگ را آئین و دین
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| − | سوی آن دیر کہن دیگر مبین
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| − | کردہ ئے کار خداوندان تمام
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| − | بگذر از لا جانب الا خرام
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| − | در گذر از لا اگر جویندہ ئی
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| − | تا رہ اثبات گیری زندہ ئی
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| − | اے کہ می خواہی نظام عالمے
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| − | جستہ ئی او را اساس محکمی؟
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| − | داستان کہنہ شستی باب باب
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| − | فکر را روشن کن از ام الکتاب
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| − | با سیہ فامان ید بیضا کہ داد
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| − | مژدۂ لا قیصر و کسری کہ داد
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| − | در گذر از جلوہ ہای رنگ رنگ
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| − | خویش را دریاب از ترک فرنگ
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| − | گر ز مکر غربیان باشی خبیر
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| − | روبہی بگذار و شیری پیشہ گیر
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| − | چیست روباہی تلاش ساز و برگ
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| − | شیر مولا جوید آزادی و مرگ
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| − | جز بہ قرآن ضیغمی روباہی است
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| − | فقر قرآن اصل شاہنشاہی است
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| − | فقر قرآن اختلاط ذکر و فکر
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| − | فکر را کامل ندیدم جز بہ ذکر
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| − | ذکر ذوق و شوق را دادن ادب
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| − | کار جان است این، کار کام و لب
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| − | خیزد از وی شعلہ ہای سینہ سوز
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| − | با مزاج تو نمی سازد ہنوز
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| − | اے شہید شاہد رعنای فکر
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| − | با تو گویم از تجلی ہای فکر
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| − | چیست قرآن ؟ خواجہ را پیغام مرگ
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| − | دستگیر بندۂ بے ساز و برگ
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| − | ہیچ خیر از مردک زرکش مجو،
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| − | "لن تنالوا البر حتی تنفقوا"
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| − | از ربا آخر چہ می زاید فتن
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| − | کش نداند لذت قرض حسن
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| − | از ربا جان تیرہ دل چون خشت و سنگ
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| − | آدمی درندہ بے دندان و چنگ
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| − | رزق خود را از زمین بردن رواست
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| − | این متاع بندہ و ملک خداست
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| − | بندۂ مومن امین، حق مالک است
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| − | غیر حق ہر شی کہ بینی ہالک است
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| − | رایت حق از ملوک آمد نگون
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| − | قریہ ہا از دخل شان خوار و زبون
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| − | آب و نان ماست از یک مائدہ
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| − | دودۂ آدم "کنفس واحدہ"
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| − | نقش قرآن تا درین عالم نشست
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| − | نقشہای کاہن و پایا شکست
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| − | فاش گویم آنچہ در دل مضمر است
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| − | این کتابی نیست چیزی دیگر است
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| − | چون بجان در رفت جان دیگر شود
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| − | جان چو دیگر شد جہان دیگر شود
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| − | مثل حق پنہان و ہم پیداست این
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| − | زندہ و پایندہ و گویاست این
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| − | اندرو تقدیر ہای غرب و شرق
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| − | سرعت اندیشہ پیدا کن چو برق
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| − | با مسلمان گفت جان بر کف بنہ
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| − | ہر چہ از حاجت فزون داری بدہ
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| − | آفریدی شرع و آئینی دگر
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| − | اندکی با نور قرآنش نگر
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| − | از بم و زیر حیات آگہ شوی
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| − | ہم ز تقدیر حیات آگہ شوی
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| − | محفل ما بے می و بے ساقی است
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| − | ساز قرآن را نواہا باقی است
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| − | زخمۂ ما بے اثر افتد اگر
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| − | آسمان دارد ھزاران زخمہ ور
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| − | ذکر حق از امتان آمد غنی
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| − | از زمان و از مکان آمد غنی
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| − | ذکر حق از ذکر ہر ذاکر جداست
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| − | احتیاج روم و شام او را کجاست
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| − | حق اگر از پیش ما برداردش
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| − | پیش قومی دیگری بگذاردش
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| − | از مسلمان دیدہ ام تقلید و ظن
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| − | ہر زمان جانم بلرزد در بدن
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| − | ترسم از روزی کہ محرومش کنند
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| − | آتش خود بر دل دیگر زنند
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| − | '''پیر رومی بہ زندہ رود می گوید کہ شعری بیار'''
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| − | پیر رومی آن سراپا جذب و درد
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| − | این سخن دانم کہ با جانش چہ کرد
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| − | از درون آہی جگر دوزی کشید
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| − | اشک او رنگین تر از خون شہید
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| − | آنکہ تیرش جز دل مردان نسفت
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| − | سوی افغانی نگاہی کرد و گفت
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| − | "دل بخون مثل شفق باید زدن
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| − | دست در فتراک حق باید زدن
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| − | جان ز امید است چون جوئی روان
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| − | ترک امید است مرگ جاودان"
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| − | باز در من دید و گفت اے زندہ رود
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| − | با دو بیتی آتش افکن در وجود
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| − | ناقۂ ما خستہ و محمل گران
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| − | تلخ تر باید نوای ساربان
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| − | امتحان پاک مردان از بلاست
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| − | تشنگان را تشنہ تر کردن رواست
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| − | در گذر مثل کلیم از رود نیل
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| − | سوی آتش گام زن مثل خلیل
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| − | نغمۂ مردی کہ دارد بوے دوست
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| − | ملتے را میبرد تا کوی دوست"
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