|
|
| Line 1: |
Line 1: |
| − | <center>
| |
| − | '''بر مزار سلطان محمود علیہ الرحمہ'''
| |
| | | | |
| − | خیزد از دل نالہ ہا بی اختیار
| |
| − | آہ ! آن شھری کہ اینجا بود پار
| |
| − |
| |
| − | آن دیار و کاخ و کو ویرانہ ایست
| |
| − | آن شکوہ و فال و فر افسانہ ایست
| |
| − |
| |
| − | گنبدی، در طوف او چرخ برین
| |
| − | تربت سلطان محمود است این
| |
| − |
| |
| − | آنکہ چون کودک لب از کوثر بشست
| |
| − | گفت در گہوارہ نام او نخست
| |
| − |
| |
| − | برق سوزان تیغ بی زنھار او
| |
| − | دشت و در لرزندہ از یلغار او
| |
| − |
| |
| − | زیر گردون آیت اﷲ رایتش
| |
| − | قدسیان قرآن سرا بر تربتش
| |
| − |
| |
| − | شوخی فکرم مرا از من ربود
| |
| − | تا نبودم در جھان دیر و زود
| |
| − |
| |
| − | رخ نمود از سینہ ام آن آفتاب
| |
| − | پردگیہا از فروغش بی حجاب
| |
| − |
| |
| − | مہر گردون از جلالش در رکوع
| |
| − | از شعاعش دوش میگردد طلوع
| |
| − |
| |
| − | وارہیدم از جہان چشم و گوش
| |
| − | فاش چون امروز دیدم صبح دوش
| |
| − |
| |
| − | شہر غزنین یک بہشت رنگ و بو
| |
| − | آب جوہا نغمہ خوان در کاخ و کو
| |
| − |
| |
| − | قصر ہای او قطار اندر قطار
| |
| − | آسمان با قبہ ہایش ھم کنار
| |
| − |
| |
| − | نکتہ سنج طوس را دیدم ببزم
| |
| − | لشکر محمود را دیدم بہ رزم
| |
| − |
| |
| − | روح سیر عالم اسرار کرد
| |
| − | تا مرا شوریدہ ئی بیدار کرد
| |
| − |
| |
| − | آنہمہ مشتاقی و سوز و سرور
| |
| − | در سخن چون رند بے پروا جسور
| |
| − |
| |
| − | تخم اشکی اندر آن ویرانہ کاشت
| |
| − | گفتگوہا با خدای خویش داشت
| |
| − |
| |
| − | تا نبودم بیخبر از راز او
| |
| − | سوختم از گرمی آواز او
| |
| − | </Center>
| |