|
|
| Line 1: |
Line 1: |
| − | <center>
| |
| − | '''بر مزار حضرت احمد شاہ بابا علیہ الرحمہ'''
| |
| | | | |
| − |
| |
| − | تربت آن خسرو روشن ضمیر
| |
| − | از ضمیرش ملتی صورت پذیر
| |
| − |
| |
| − | گنبد او را حرم داند سپہر
| |
| − | با فروغ از طوف او سیمای مہر
| |
| − |
| |
| − | مثل فاتح آن امیر صف شکن
| |
| − | سکہ ئی زد ھم بہ اقلیم سخن
| |
| − |
| |
| − | ملتی را داد ذوق جستجو
| |
| − | قدسیان تسبیح خوان بر خاک او
| |
| − |
| |
| − | از دل و دست گہر ریزی کہ داشت
| |
| − | سلطنت ہا برد و بی پروا گذاشت
| |
| − |
| |
| − | نکتہ سنج و عارف و شمشیر زن
| |
| − | روح پاکش با من آمد در سخن
| |
| − |
| |
| − | گفت می دانم مقام تو کجاست
| |
| − | نغمۂ تو خاکیان را کیمیاست
| |
| − |
| |
| − | خشت و سنگ از فیض تو دارای دل
| |
| − | روشن از گفتار تو سینای دل
| |
| − |
| |
| − | پیش ما اے آشنای کوی دوست
| |
| − | یک نفس بنشین کہ داری بوی دوست
| |
| − |
| |
| − | ایخوش آن کو از خودی آئینہ ساخت
| |
| − | وندر آن آئینہ عالم را شناخت
| |
| − |
| |
| − | پیر گردید این زمین و این سپہر
| |
| − | ماہ کور از کور چشمیہای مہر
| |
| − |
| |
| − | گرمی ہنگامہ ئی می بایدش
| |
| − | تا نخستین رنگ و بو باز آیدش
| |
| − |
| |
| − | بندۂ مومن سرافیلی کند
| |
| − | بانگ او ہر کہنہ را برہم زند
| |
| − |
| |
| − | اے ترا حق داد جان ناشکیب
| |
| − | تو ز سر ملک و دین داری نصیب
| |
| − |
| |
| − | فاش گو با پور نادر فاش گوی
| |
| − | باطن خود را بہ ظاہر فاش گوی
| |
| − | </Center>
| |