|
|
| Line 1: |
Line 1: |
| − | <center>
| |
| − | '''خطاب بہ مہر عالمتاب
| |
| − | '''
| |
| | | | |
| − | اے امیر خاور اے مہر منیر
| |
| − | می کنی ہر ذرہ را روشن ضمیر
| |
| − |
| |
| − | از تو این سوز و سرور اندر وجود
| |
| − | از تو ہر پوشیدہ را ذوق نمود
| |
| − |
| |
| − | می رود روشنتر از دست کلیم
| |
| − | زورق زرین تو در جوی سیم
| |
| − |
| |
| − | پرتو تو ماہ را مہتاب داد
| |
| − | لعل را اندر دل سنگ آب داد
| |
| − |
| |
| − | لالہ را سوز درون از فیض تست
| |
| − | در رگ او موج خون از فیض تست
| |
| − |
| |
| − | نرگسان صد پردہ را بر می درد
| |
| − | تا نصیبی از شعاع تو برد
| |
| − |
| |
| − | خوش بیا صبح مراد آوردہ ئی
| |
| − | ہر شجر را نخل سینا کردہ ئی
| |
| − |
| |
| − | تو فروغ صبح و من پایان روز
| |
| − | در ضمیر من چراغی بر فروز
| |
| − |
| |
| − | تیرہ خاکم را سراپا نور کن
| |
| − | در تجلی ہای خود مستور کن
| |
| − | تا بروز آرم شب افکار شرق
| |
| − | بر فروزم سینۂ احرار شرق
| |
| − |
| |
| − | از نوائی پختہ سازم خام را
| |
| − | گردش دیگر دہم ایام را
| |
| − |
| |
| − | فکر شرق آزاد گردد از فرنگ
| |
| − | از سرود من بگیرد آب و رنگ
| |
| − |
| |
| − | زندگی از گرمی ذکر است و بس
| |
| − | حریت از عفت فکر است و بس
| |
| − |
| |
| − | چون شود اندیشۂ قومی خراب
| |
| − | ناسرہ گردد بدستش سیم ناب
| |
| − |
| |
| − | میرد اندر سینہ اش قلب سلیم
| |
| − | در نگاہ او کج آید مستقیم
| |
| − |
| |
| − | بر کران از حرب و ضرب کائنات
| |
| − | چشم او اندر سکون بیند حیات
| |
| − |
| |
| − | موج از دریاش کم گردد بلند
| |
| − | گوہر او چون خزف نا ارجمند
| |
| − |
| |
| − | پس نخستین بایدش تطہیر فکر
| |
| − | بعد از آن آسان شود تعمیر فکر
| |
| − |
| |
| − | </Center>
| |