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| − | '''قندہار و زیارت خرقہ مبارک'''
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| − | قندہار آن کشور مینو سواد
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| − | اہل دل را خاک او خاک مراد
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| − | رنگ ہا، بوہا، ہواہا، آب ہا
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| − | آب ہا تابندہ چون سیماب ہا
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| − | لالہ ھا در خلوت کہسار ہا
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| − | نارھا یخ بستہ اندر نارہا
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| − | کوی آن شہر است ما را کوی دوست
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| − | ساربان بر بند محمل سوی دوست
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| − | می سرایم دیگر از یاران نجد
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| − | از نوائی، ناقہ را آرم بہ وجد
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| − | ''''غزل'''
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| − | از دیر مغان آیم بی گردش صہباست
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| − | در منزل لا بودم از بادہ الا مست
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| − | دانم کہ نگاہ او ظرف ہمہ کس بیند
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| − | کرد است مرا ساقی از عشوہ و ایما مست
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| − | وقت است کہ بگشایم میخانۂ رومی باز
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| − | پیران حرم دیدم در صحن کلیسا مست
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| − | این کار حکیمی نیست دامان کلیمی گیر
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| − | صد بندۂ ساحل مست یک بندہ دریا مست
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| − | دل را بہ چمن بردم از باد چمن افسرد
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| − | میرد بخیابانہا این لالۂ صحرا مست
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| − | از حرف دلاویزش اسرار حرم پیدا
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| − | دی کافرکی دیدم در وادی بطحا مست
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| − | سینا است کہ فاران است یارب چہ مقام است این
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| − | ہر ذرہ خاک من چشمی است تماشا مست
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| − | خرقۂ آن "برزخ لایبغیان"
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| − | دیدمش در نکتۂ "لی خرقتان"
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| − | دین او آئین او تفسیر کل
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| − | در جبین او خط تقدیر کل
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| − | عقل را او صاحب اسرار کرد
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| − | عشق را او تیغ جوھر دار کرد
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| − | کاروان شوق را او منزل است
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| − | ما ہمہ یک مشت خاکیم او دل است
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| − | آشکارا دیدنش اسرای ماست
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| − | در ضمیرش مسجد اقصای ماست
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| − | آمد از پیراہن او بوی او
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| − | داد ما را نعرہ اﷲ ہو
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| − | با دل من شوق بی پروا چہ کرد
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| − | بادۂ پر زور با مینا چہ کرد
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| − | رقصد اندر سینہ از زور جنون
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| − | تا ز راہ دیدہ میآید برون
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| − | گفت "من جبریلم و نور مبین"
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| − | پیش ازین او را ندیدم اینچنین
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| − | شعر رومی خواند و خندید و گریست
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| − | یا رب این دیوانۂ فرزانہ کیست؟
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| − | در حرم با من سخن زندانہ گفت
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| − | از می و مغ زادہ و پیمانہ گفت
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| − | گفتمش این حرف بیباکانہ چیست
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| − | لب فرو بند این مقام خامشی ست
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| − | من ز خون خویش پروردم ترا
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| − | صاحب آہ سحر کردم ترا
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| − | بازیاب این نکتہ را اے نکتہ رس
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| − | عشق مردان ضبط احوال است و بس
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| − | گفت عقل و ہوش آزار دل است
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| − | مستی و وارفتگی کار دل است
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| − | نعرہ ہا زد تا فتاد اندر سجود
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| − | شعلۂ آواز او بود او نبود
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