|
|
| Line 1: |
Line 1: |
| − | <div dir ="rtl ">
| + | asasddf |
| − | '''نغمۂ بعل'''
| |
| − | | |
| − | آدم این نیلی تتق را بر درید
| |
| − | | |
| − | آنسوی گردون خدائی را ندید
| |
| − | | |
| − | در دل آدم بجز افکار چیست
| |
| − | | |
| − | ہمچو موج این سر کشید و آن رمید
| |
| − | | |
| − | جانش از محسوس می گیرد قرار
| |
| − | | |
| − | بو کہ عھد رفتہ باز آید پدید
| |
| − | | |
| − | زندہ باد افرنگی مشرق شناس
| |
| − | | |
| − | آنکہ ما را از لحد بیرون کشید
| |
| − | | |
| − | اے خدایان کہن وقت است وقت
| |
| − | | |
| − | در نگر آن حلقۂ وحدت شکست
| |
| − | | |
| − | آل ابراہیم بے ذوق الست
| |
| − | | |
| − | صحبتش پاشیدہ جامش ریز ریز
| |
| − | | |
| − | آنکہ بود از بادۂ جبریل مست
| |
| − | | |
| − | مرد حر افتاد در بند جہات
| |
| − | | |
| − | با وطن پیوست و از یزدان گسست
| |
| − | | |
| − | خون او سرد از شکوہ دیریان
| |
| − | | |
| − | لاجرم پیر حرم زنار بست
| |
| − | | |
| − | اے خدایان کہن وقت است وقت
| |
| − | | |
| − | در جھان باز آمد ایام طرب
| |
| − | | |
| − | دین ہزیمت خوردہ از ملک و نسب
| |
| − | | |
| − | از چراغ مصطفی اندیشہ چیست
| |
| − | | |
| − | زانکہ او را پف زند صد بولہب
| |
| − | | |
| − | گرچہ می آید صدای لاالہ
| |
| − | | |
| − | آنچہ از دل رفت کی ماند بہ لب
| |
| − | | |
| − | اہرمن را زندہ کرد افسون غرب
| |
| − | | |
| − | روز یزدان زرد رو از بیم شب
| |
| − | | |
| − | اے خدایان کہن وقت است وقت
| |
| − | | |
| − | بند دین از گردنش باید گشود
| |
| − | | |
| − | بندۂ ما بندۂ آزاد بود
| |
| − | | |
| − | تا صلوت او را گران آید ہمی
| |
| − | | |
| − | رکعتی خواہیم و آن ھم بے سجود
| |
| − | | |
| − | جذبہ ہا از نغمہ می گردد بلند
| |
| − | | |
| − | پس چہ لذت در نماز بے سرود
| |
| − | | |
| − | از خداوندی کہ غیب او را سزد
| |
| − | | |
| − | خوشتر آن دیوی کہ آید در شہود
| |
| − | | |
| − | اے خدایان کہن وقت است وقت
| |