|
|
| Line 1: |
Line 1: |
| − | <center>
| |
| − | '''خطاب بہ پادشاہ اسلام اعلیحضرت ظاہر شاہ'''
| |
| | | | |
| − |
| |
| − | اے قبای پادشاہی بر تو راست
| |
| − | سایۂ تو خاک ما را کیمیاست
| |
| − |
| |
| − | خسروی را از وجود تو عیار
| |
| − | سطوت تو ملک و دولت را حصار
| |
| − |
| |
| − | از تو اے سرمایۂ فتح و ظفر
| |
| − | تخت احمد شاہ را شانی دگر
| |
| − |
| |
| − | سینہ ہا بی مہر تو ویرانہ بہ
| |
| − | از دل و از آرزو بیگانہ بہ
| |
| − |
| |
| − | آبگون تیغی کہ دارے در کمر
| |
| − | نیم شب از تاب او گردد سحر
| |
| − |
| |
| − | نیک میدانم کہ تیغ نادر است
| |
| − | من چہ گویم باطن او ظاہر است
| |
| − |
| |
| − | حرف شوق آوردہ ام از من پذیر
| |
| − | از فقیری رمز سلطانی بگیر
| |
| − |
| |
| − | اے نگاہ تو ز شاہین تیز تر
| |
| − | گرد این ملک خدا دادی نگر
| |
| − |
| |
| − | این کہ می بینیم از تقدیر کیست
| |
| − | چیست آن چیزی کہ میبایست و نیست
| |
| − |
| |
| − | روز و شب آئینۂ تدبیر ماست
| |
| − | روز و شب آئینۂ تقدیر ماست
| |
| − |
| |
| − | با تو گویم اے جوان سخت کوش
| |
| − | چیست فردا ؟ دختر امروز و دوش
| |
| − |
| |
| − | ہر کہ خود را صاحب امروز کرد
| |
| − | گرد او گردد سپہر گرد گرد
| |
| − |
| |
| − | او جہان رنگ و بو را آبروست
| |
| − | دوش ازو، امروز ازو، فردا ازوست
| |
| − |
| |
| − | مرد حق سرمایۂ روز و شب است
| |
| − | زانکہ او تقدیر خود را کوکب است
| |
| − |
| |
| − | بندۂ صاحب نظر پیر امم
| |
| − | چشم او بینای تقدیر امم
| |
| − |
| |
| − | از نگاہش تیز تر شمشیر نیست
| |
| − | ما ہمہ نخچیر، او نخچیر نیست
| |
| − |
| |
| − | لرزد از اندیشۂ آن پختہ کار
| |
| − | حادثات اندر بطون روزگار
| |
| − |
| |
| − | چون پدر اہل ہنر را دوست دار
| |
| − | بندۂ صاحب نظر را دوست دار
| |
| − |
| |
| − | ہمچو آن خلد آشیان بیدار زی
| |
| − | سخت کوش و پر دم و کرار زی
| |
| − |
| |
| − | می شناسی معنی کرار چیست؟
| |
| − | این مقامی از مقامات علی است
| |
| − |
| |
| − | امتان را در جہان بی ثبات
| |
| − | نیست ممکن جز بہ کراری حیات
| |
| − |
| |
| − | سر گذشت آل عثمان را نگر
| |
| − | از فریب غربیان خونین جگر
| |
| − |
| |
| − | تا ز کراری نصیبی داشتند
| |
| − | در جہان، دیگر علم افراشتند
| |
| − |
| |
| − | مسلم ہندی چرا میدان گذاشت؟
| |
| − | ہمت او بوی کراری نداشت
| |
| − |
| |
| − | مشت خاکش آنچنان گردیدہ سرد
| |
| − | گرمی آواز من کارے نکرد
| |
| − |
| |
| − | ذکر و فکر نادری در خون تست
| |
| − | قاہری با دلبری در خون تست
| |
| − |
| |
| − | اے فروغ دیدۂ برنا و پیر
| |
| − | سرکار از ہاشم و محمود گیر
| |
| − |
| |
| − | ہم از آن مردی کہ اندر کوہ و دشت
| |
| − | حق ز تیغ او بلند آوازہ گشت
| |
| − |
| |
| − | روز ہا، شب ہا تپیدن میتوان
| |
| − | عصر دیگر آفریدن میتوان
| |
| − |
| |
| − | صد جہان باقی است در قرآن ہنوز
| |
| − | اندر آیاتش یکی خود را بسوز
| |
| − |
| |
| − | باز افغان را از آن سوزی بدہ
| |
| − | عصر او را صبح نو روزی بدہ
| |
| − |
| |
| − | ملتی گم گشتۂ کوہ و کمر
| |
| − | از جبینش دیدہ ام چیزی دگر
| |
| − |
| |
| − | زانکہ بود اندر دل من سوز و درد
| |
| − | حق ز تقدیرش مرا آگاہ کرد
| |
| − |
| |
| − | کاروبارش را نکو سنجیدہ ام
| |
| − | آنچہ پنہان است پیدا دیدہ ام
| |
| − |
| |
| − | مرد میدان زندہ از اﷲ ہوست
| |
| − | زیر پای او جہان چار سوست
| |
| − |
| |
| − | بندہ ئی کو دل بغیراﷲ نبست
| |
| − | می توان سنگ از زجاج او شکست
| |
| − |
| |
| − | او نگنجد در جہان چون و چند
| |
| − | تہمت ساحل بہ این دریا مبند
| |
| − |
| |
| − | چون ز روی خویش بر گیرد حجاب
| |
| − | او حسابست او ثوابست او عذاب
| |
| − |
| |
| − | برگ و ساز ما کتاب و حکمت است
| |
| − | این دو قوت اعتبار ملت است
| |
| − |
| |
| − | آن فتوحات جہان ذوق و شوق
| |
| − | این فتوحات جہان تحت و فوق
| |
| − |
| |
| − | ہر دو انعام خدای لایزال
| |
| − | مومنان را آن جمال است این جلال
| |
| − |
| |
| − | حکمت اشیا فرنگی زاد نیست
| |
| − | اصل او جز لذت ایجاد نیست
| |
| − |
| |
| − | نیک اگر بینی مسلمان زادہ است
| |
| − | این گہر از دست ما افتادہ است
| |
| − |
| |
| − | چون عرب اندر اروپا پر گشاد
| |
| − | علم و حکمت را بنا دیگر نہاد
| |
| − |
| |
| − | دانہ آن صحرا نشینان کاشتند
| |
| − | حاصلش افرنگیان برداشتند
| |
| − |
| |
| − | این پری از شیشہ اسلاف ماست
| |
| − | باز صیدش کن کہ او از قاف ماست
| |
| − |
| |
| − | لیکن از تہذیب لا دینی گریز
| |
| − | زانکہ او با اہل حق دارد ستیز
| |
| − |
| |
| − | فتنہ ھا این فتنہ پرداز آورد
| |
| − | لات و عزی در حرم باز آورد
| |
| − |
| |
| − | از فسونش دیدۂ دل نا بصیر
| |
| − | روح از بی آبی او تشنہ میر
| |
| − |
| |
| − | لذت بیتابی از دل می برد
| |
| − | بلکہ دل زین پیکر گل می برد
| |
| − |
| |
| − | کہنہ دزدی غارت او برملا ست
| |
| − | لالہ می نالد کہ داغ من کجاست
| |
| − |
| |
| − | حق نصیب تو کند ذوق حضور
| |
| − | باز گویم آنچہ گفتم در زبور
| |
| − |
| |
| − | "مردن و ہم زیستن اے نکتہ رس
| |
| − | این ہمہ از اعتبارات است و بس
| |
| − |
| |
| − | مرد کر سوز نوا را مردہ ئے
| |
| − | لذت صوت و صدا را مردہ ئی
| |
| − |
| |
| − | پیش چنگی مست و مسرور است کور
| |
| − | پیش رنگی زندہ در گور است کور
| |
| − |
| |
| − | روح باحق زندہ و پایندہ است
| |
| − | ورنہ این را مردہ، آن را زندہ است
| |
| − |
| |
| − | آنکہ "حی لایموت" آمد حق است
| |
| − | زیستن با حق حیات مطلق است
| |
| − |
| |
| − | ہر کہ بی حق زیست جز مردار نیست
| |
| − | گرچہ کس در ماتم او زار نیست"
| |
| − |
| |
| − | برخور از قرآن اگر خواہی ثبات
| |
| − | در ضمیرش دیدہ ام آب حیات
| |
| − |
| |
| − | می دہد ما را پیام "لاتخف"
| |
| − | می رساند بر مقام لاتخف
| |
| − |
| |
| − | قوت سلطان و میر از لاالہ
| |
| − | ہیبت مرد فقیر از لاالہ
| |
| − |
| |
| − | تا دو تیغ لا و الا داشتیم
| |
| − | ماسوی اﷲ را نشان نگذاشتیم
| |
| − |
| |
| − | خاوران از شعلۂ من روشن است
| |
| − | اے خنک مردی کہ در عصر من است
| |
| − |
| |
| − | از تب و تابم نصیب خود بگیر
| |
| − | بعد ازین ناید چو من مرد فقیر
| |
| − |
| |
| − | گوہر دریای قرآن سفتہ ام
| |
| − | شرح رمز "صبغة اﷲ" گفتہ ام
| |
| − |
| |
| − | با مسلمانان غمی بخشیدہ ام
| |
| − | کہنہ شاخی را نمی بخشیدہ ام
| |
| − |
| |
| − | عشق من از زندگی دارد سراغ
| |
| − | عقل از صہبای من روشن ایاغ
| |
| − |
| |
| − | نکتہ ہای خاطر افروزی کہ گفت؟
| |
| − | با مسلمان حرف پرسوزی کہ گفت؟
| |
| − |
| |
| − | ہمچو نے نالیدم اندر کوہ و دشت
| |
| − | تا مقام خویش بر من فاش گشت
| |
| − |
| |
| − | حرف شوق آموختم وا سوختم
| |
| − | آتش افسردہ باز افروختم
| |
| − |
| |
| − | با من آہ صبحگاہی دادہ اند
| |
| − | سطوت کوہی بہ کاہی دادہ اند
| |
| − |
| |
| − | دارم اندر سینہ نور لاالہ
| |
| − | در شراب من سرور لاالہ
| |
| − |
| |
| − | فکر من گردون مسیر از فیض اوست
| |
| − | جوی ساحل ناپذیر از فیض اوست
| |
| − |
| |
| − | پس بگیر از بادہ من یک دو جام
| |
| − | تا درخشی مثل تیغ بی نیام
| |
| − | </Center>
| |