|
|
| Line 1: |
Line 1: |
| − | <div dir="rtl">
| + | dsffdf |
| − | '''سوال دوم'''
| |
| − | | |
| − | چہ بحر است این کہ علمش ساحل آمد
| |
| − | | |
| − | ز قعر او چہ گوھر حاصل آمد
| |
| − | | |
| − | '''جواب'''
| |
| − | | |
| − | حیات پر نفس بحر روانی
| |
| − | | |
| − | شعور آگہے او را کرانی
| |
| − | | |
| − | چہ دریائی کہ ژرف و موج داراست
| |
| − | | |
| − | ہزاران کوہ و صحرا بر کنار است
| |
| − | | |
| − | مپرس از موجہای بیقرارش
| |
| − | | |
| − | کہ ہر موجش برون جست از کنارش
| |
| − | | |
| − | گذشت از بحر و صحرا را نمی داد
| |
| − | | |
| − | نگہ را لذت کیف و کمی داد
| |
| − | | |
| − | ہر آن چیزی کہ آید در حضورش
| |
| − | | |
| − | منور گردد از فیض شعورش
| |
| − | | |
| − | بخلوت مست و صحبت ناپذیر است
| |
| − | | |
| − | ولی ہر شی ز نورش مستنیر است
| |
| − | | |
| − | نخستین می نماید مستنیرش
| |
| − | | |
| − | کند آخر بہ آئینی اسیرش
| |
| − | | |
| − | شعورش با جہان نزدیک تر کرد
| |
| − | | |
| − | جہان او را ز راز او خبر کرد
| |
| − | | |
| − | خرد بند نقاب از رخ گشودش
| |
| − | | |
| − | ولیکن نطق عریان تر نمودش
| |
| − | | |
| − | نگنجد اندرین دیر مکافات
| |
| − | | |
| − | جہان او را مقامی از مقامات
| |
| − | | |
| − | برون از خویش می بینی جہانرا
| |
| − | | |
| − | در و دشت و یم و صحرا و کان را
| |
| − | | |
| − | جہان رنگ و بو گلدستۂ ما
| |
| − | | |
| − | ز ما آزاد و ھم وابستۂ ما
| |
| − | | |
| − | خودی او را بیک تار نگہ بست
| |
| − | | |
| − | زمین و آسمان و مہر و مہ بست
| |
| − | | |
| − | دل ما را بہ او پوشیدہ راہی است
| |
| − | | |
| − | کہ ہر موجود ممنون نگاہی است
| |
| − | | |
| − | گر او را کس نبیند زار گردد
| |
| − | | |
| − | اگر بیند، یم و کہسار گردد
| |
| − | | |
| − | جہان را فربہی از دیدن ما
| |
| − | | |
| − | نہالش رستہ از بالیدن ما
| |
| − | | |
| − | حدیث ناظر و منظور رازی است
| |
| − | | |
| − | دل ہر ذرہ در عرض نیازی است
| |
| − | | |
| − | '''ق'''
| |
| − | | |
| − | تو اے شاہد مرا مشہود گردان
| |
| − | | |
| − | ز فیض یک نظر موجود گردان
| |
| − | | |
| − | کمال ذات شی موجود بودن
| |
| − | | |
| − | برای شاہدی مشہود بودن
| |
| − | | |
| − | زوالش در حضور ما نبودن
| |
| − | | |
| − | منور از شعور ما نبودن
| |
| − | | |
| − | جہان غیر از تجلی ہای ما نیست
| |
| − | | |
| − | کہ بی ما جلوۂ نور و صدا نیست
| |
| − | | |
| − | تو ہم از صحبتش یاری طلب کن
| |
| − | | |
| − | نگہ را از خم و پیچش ادب کن
| |
| − | | |
| − | یقین میدان کہ شیران شکاری
| |
| − | | |
| − | درین رہ خواستند از مور یاری
| |
| − | | |
| − | بیاری ہای او از خود خبر گیر
| |
| − | | |
| − | تو جبریل امینی بال و پر گیر
| |
| − | | |
| − | بہ بسیاری گشا چشم خرد را
| |
| − | | |
| − | کہ دریابی تماشای احد را
| |
| − | | |
| − | نصیبب خود ز بوی پیرہن گیر
| |
| − | | |
| − | بہ کنعان نکہت از مصر و یمن گیر
| |
| − | | |
| − | خودی صیاد و نخچیرش مہ و مہر
| |
| − | | |
| − | اسیر بند تدبیرش مہ و مہر
| |
| − | | |
| − | چو آتش خویش را اندر جہان زن
| |
| − | | |
| − | شبیخون بر مکان و لامکان زن
| |
| − | </div>
| |