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| − | '''سوال ہشتم'''
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| − | کدامی نکتہ را نطق است اناالحق
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| − | چہ گوئی ھرزہ بود آن ٓرمز مطلق
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| − | '''جواب'''
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| − | من از رمز اناالحق باز گویم
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| − | و گر با ہند و ایران راز گویم
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| − | مغی در حلقۂ دیر این سخن گفت
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| − | حیات از خود فریبی خورد و من گفت
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| − | خدا خفت و وجود ما ز خوابش
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| − | وجود ما نمود ما ز خوابش
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| − | مقام تحت وفوق و چار سو خواب
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| − | سکون و سیر و شوق و جستجو خواب
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| − | دل بیدار و عقل نکتہ بین خواب
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| − | گمان و فکر و تصدیق و یقین خواب
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| − | ترا این چشم بیداری بخواب است
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| − | ترا گفتار و کرداری بخواب است
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| − | چو او بیدار گردد دیگری نیست
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| − | متاع شوق را سوداگری نیست
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| − | فروغ دانش ما از قیاس است
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| − | قیاس ما ز تقدیر حواس است
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| − | چو حس دیگر شد این عالم دگر شد
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| − | سکون و سیر و کیف و کم دگر شد
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| − | توان گفتن جہان رنگ و بو نیست
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| − | زمین و آسمان و کاخ و کو نیست
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| − | توان گفتن کہ خوابی یا فسونی است
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| − | حجاب چہرہ آن بی چگونی است
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| − | توان گفتن ہمہ نیرنگ ہوش است
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| − | فریب پردہ ہای چشم و گوش است
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| − | خودی از کائنات رنگ و بو نیست
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| − | حواس ما میان ما و او نیست
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| − | نگہ را در حریمش نیست راہی
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| − | کنی خود را تماشا بی نگاہی
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| − | حساب روزش از دور فلک نیست
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| − | بخود بینی ظن و تخمین و شک نیست
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| − | اگر کوئی کہ من وہم و گمان است
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| − | نمودش چون نمود این و آن است
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| − | بگو با من کہ دارای گمان کیست
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| − | یکی در خود نگر آن بی نشان کیست
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| − | جہان پیدا و محتاج دلیلی
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| − | نمیآید بہ فکر جبرئیلی
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| − | خودی پنہان ز حجت بی نیاز است
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| − | یکی اندیش و دریاب این چہ رازست
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| − | خودی را حق بدان باطل مپندار
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| − | خودی را کشت بی حاصل مپندار
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| − | خودی چون پختہ گردد لازوالست
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| − | فراق عاشقان عین وصالست
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| − | شرر را تیز بالی میتوان داد
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| − | تپید لایزالی میتوان داد
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| − | دوام حق جزای کار او نیست
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| − | کہ او را این دوام از جستجو نیست
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| − | دوام آن بہ کہ جان مستعاری
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| − | شود از عشق و مستی پایداری
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| − | وجود کوہسار و دشت و در ہیچ
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| − | جہان فانی خودی باقی دگر ہیچ
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| − | دگر از شنکر و منصور کم گوی
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| − | خدا را ھم براہ خویشتن جوی
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| − | بخود گم بہر تحقیق خودی شو
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| − | انا الحق گوی و صدیق خودی شو
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